फोर्टिस हेल्थकेयर में अदायु माइंडफुलनेस हॉस्पिटल में सलाहकार मनोचिकित्सक डॉ. नेहा अग्रवाल से जब हमने कबीर की मानसिक स्थिति को साझा किया तो उन्होंने बताया मनोविज्ञान की भाषा में इसे डिस्थीमिया या पर्सिस्टेंट डिप्रेसिव डिसऑर्डर कहा जाता है।
हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन के लक्षण नॉर्मल डिप्रेशन से कुछ अलग हैं। नॉर्मल डिप्रेशन में इंसान अकेला और उदास रहता है लेकिन इस डिप्रेशन में इंसान खुश दिखता है।
क्या आपने कभी ऐसे इंसान को देखा है जो ऑफिस में हर वक्त काम में लगा रहता है, जिसकी हंसी सबसे तेज है। हंसता है तो लगता है जैसे गुलिस्तां के सारे गुलाब खिल गए हैं। उसका सोशल मीडिया अकाउंट खुशियों से भरा है लेकिन वो अंदर से गहरी खामोशी में डूबा पड़ा है। उसे काम से थकान नहीं होती लेकिन उसकी अंदर की थकान उसे अंदर ही अंदर खोखला कर रही है। हम मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले कबीर की मानसिक स्थिति का हवाला देते हुए युवाओं में पनप रहे इस खास डिप्रेशन से आपको रूह ब रूह करा रहे हैं जो उसे जाहिर नहीं करता लेकिन अंदर से खामोश है। इस मानसिक स्थिति को मेडिकल भाषा में हाई फंक्शनिंग डिप्रेशन कहा जाता है।
हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन के लक्षण नॉर्मल डिप्रेशन से कुछ अलग हैं। नॉर्मल डिप्रेशन में इंसान अकेला और उदास रहता है लेकिन इस डिप्रेशन में इंसान खुश दिखता है।
क्या आपने कभी ऐसे इंसान को देखा है जो ऑफिस में हर वक्त काम में लगा रहता है, जिसकी हंसी सबसे तेज है। हंसता है तो लगता है जैसे गुलिस्तां के सारे गुलाब खिल गए हैं। उसका सोशल मीडिया अकाउंट खुशियों से भरा है लेकिन वो अंदर से गहरी खामोशी में डूबा पड़ा है। उसे काम से थकान नहीं होती लेकिन उसकी अंदर की थकान उसे अंदर ही अंदर खोखला कर रही है। हम मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले कबीर की मानसिक स्थिति का हवाला देते हुए युवाओं में पनप रहे इस खास डिप्रेशन से आपको रूह ब रूह करा रहे हैं जो उसे जाहिर नहीं करता लेकिन अंदर से खामोश है। इस मानसिक स्थिति को मेडिकल भाषा में हाई फंक्शनिंग डिप्रेशन कहा जाता है।
क्या है हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन
हाई फंक्शनिंग डिप्रेशन को साइकोलॉजी में समझे तो ये ऐसा तनाव है जिसमें इंसान में तनाव के लक्षण तो होते हैं लेकिन उस तनाव को वो अपने काम,अपनी डेली एक्टिविटी और सोशल मीडिया लाइफ में दाखिल नहीं होने देता। फोर्टिस हेल्थकेयर में अदायु माइंडफुलनेस हॉस्पिटल में सलाहकार मनोचिकित्सक डॉ. नेहा अग्रवाल से जब हमने कबीर की मानसिक स्थिति को साझा किया तो उन्होंने बताया मनोविज्ञान की भाषा में इसे डिस्थीमिया (Dysthymia) या पर्सिस्टेंट डिप्रेसिव डिसऑर्डर कहा जाता है, लेकिन आम बोलचाल में हम इसे हाई फंक्शनिंग डिप्रेशन कहते हैं। ये तनाव का एक ऐसा मायाजाल है जिसमें इंसान दूसरों की नजरों में काफी सफल, कामयाब और खुशमिजाज़ दिखता है लेकिन वो मानसिक रूप से खालीपन से जूझ रहा होता है। इस डिप्रेशन को स्माइली डिप्रेशन भी कहते हैं।
हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन के लक्षण
हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन के लक्षण नॉर्मल डिप्रेशन से कुछ अलग होते हैं। नॉर्मल डिप्रेशन में इंसान अकेला रहता है,उदास रहता है सोशल लाइफ से दूर भागता है लेकिन हाई फंक्शनिंग डिप्रेशन में इंसान ऊपर से कुछ भी जाहिर नहीं करता। वो अकेला नहीं रहता, तनाव दिखाता नहीं, रोता नहीं बल्कि हंसता है। इस तरह के तनाव में इंसान जैसे ही घर लौटता है तो वो गहरी खामोशी और तनाव में डूब जाता है।
ये वो अवसाद है जो बिस्तर पर नहीं लेटाता, बल्कि आपको एक रोबोट की तरह काम करने पर मजबूर कर देता है। इस तनाव से पीड़ित इंसान अंदर से उदास रहता है, उसे किसी काम को करने से अंदर से खुशी नहीं मिलती वो सिर्फ दिखावा के लिए सब कुछ करता है। कॉमन डिप्रेशन से शिकार इंसान के लक्षण लोगों को दिखते हैं लेकिन हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन में लोगों को इसके लक्षण नहीं दिखते। इस तनाव के लक्षणों की बात करें तोअत्यधिक परफेक्शनलिज्म
सामाजिक मेलजोल के बाद भारी थकान महसूस होना।
भोजन और नींद के पैटर्न में बदलाव
खुद की उपलब्धियों पर गर्व न होना
रोबोट की तरह लगातार काम करना, चाहें मन हो ना हो शामिल है।
किन लोगों में है हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन बढ़ने का खतरा
हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन होने का सबसे ज्यादा खतरा युवाओं में खासतौर पर महिलाओं में होता है। जॉब के कारण और खुद को घर और बाहर साबित करने की जिद युवाओं को इस डिप्रेशन का शिकार बना रही है। कुछ युवाओं को जॉब जाने का खतरा रहता है तो कुछ पर जिम्मेदारियों का बोझ बहुत ज्यादा है। कुछ लोग रिश्तों को सुधारने के लिए, नए रिश्ते बनाने के लिए लगातार जद्दोजहद करते रहते हैं और फिर भी उन्हें कामयाबी नहीं मिलती, ऐसे लोग भी हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन का शिकार होते हैं।
हाई प्रोफेशानिज्म इस डिप्रेशन का कारण है। सोशल मीडिया भी कई बार इस तनाव का कारण बनता है। सोशल मीडिया पर लोगों को खुश देखकर खुद से कंपैरिजन करते हैं और अंदर से तनाव में आते हैं। इस तरह के तनाव में जेनेटिक फैक्टर भी जिम्मेदार हो सकते हैं। इस डिप्रेशन के लिए डिप्रेशन लाइफस्टाइल, क्रोनिक स्ट्रेस, ट्रॉमा और पर्सनालिटी फैक्टर्स भी अहम भूमिका निभाते हैं।
न्यूरोट्रांसमीटर और हार्मोन का असंतुलन है जिम्मेदार
हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन के लिए सेरोटोनिन,डोपामिन,नोरएपिनेफ्रीन ,कोर्टिसोल, मेलाटोनिन हार्मोन जिम्मेदार हो सकते हैं। इन हार्मोन के असंतुलन से नींद, मूड,थकान,फोकस,मूड और मानसिक स्थिति पर पड़ता है। जब मस्तिष्क में सेरोटोनिन का स्तर गिरता है, तो व्यक्ति चाहकर भी खुश महसूस नहीं कर पाता। यह स्थिति केवल इच्छाशक्ति की कमी नहीं है। हमारे मस्तिष्क में कुछ न्यूरोट्रांसमीटर और हार्मोन होते हैं जो हमारे व्यवहार को कंट्रोल करते हैं।
क्या इस डिप्रेशन में मरीज सुसाइड भी कर सकता है ?
डॉक्टर नेहा ने बताया अगर इस बीमारी के लक्षणों को समय पर समझा नहीं जाए तो ये स्थिति गंभीर हो सकती है। ऐसी स्थिति में मरीज के मन में खुद को नुकसान पहुंचाने के भी ख्याल आते हैं। अगर आप भी अपने आस-पास इस तरह के किसी शख्स को देखते हैं तो इस हेल्पलाइन नंबर पर सूचना दे सकते हैं। KIRAN: 1800-599-0019 इस नंबर पर मेंटल हेल्थ से जुड़े मुद्दों को गंभीरता से समझा जाता है और उनका समाधान भी किया जाता है।
हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन का डायग्नोज कैसे किया जाता है?
इस तनाव का पता लगाने के लिए साइकॉलोजिस्ट व्यक्ति से उसके मूड, व्यवहार, नींद, भूख, एनर्जी के स्तर और रोजमर्रा की कार्यक्षमता के बारे में विस्तार से बात करते हैं। अगर उदासी, खालीपन, थकान, कम आत्म-सम्मान जैसे लक्षण कम से कम 2 साल तक लगातार बने हुए है को हाई फंक्शनिंग डिप्रेशन की आशंका हो सकती है।
कुछ स्क्रीनिंग टेस्ट पहचान करने में करते हैं मददPHQ-9 (Patient Health Questionnaire)
BDI (Beck Depression Inventory) ये टेस्ट लक्षणों की गंभीरता को मापने में मदद करते हैं।
हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन से कैसे बचाव करेंइस तनाव से बाहर आने के लिए मेडिटेशन असरदार होता है। ध्यान इस तनाव से बाहर आने में मदद करता है।
फैमिली और फ्रेंड्स इस परेशानी से बाहर आने में स्पोर्टिव इन्वायरमेंट देता है। दवाओं और थेरेपी के साथ फैमिली फ्रेंड का स्पोर्टिव माहौल इस तनाव से उबरने में मदद करता है।
अपनी भावनाओं को स्वीकार करें। मैं ठीक हूं का मुखौटा हटा दें और अंदर की उदासी और खालीपन को दूर करने पर काम करें।
वर्क-लाइफ बैलेंस बनाएं। लगातार परफॉर्म करने का दबाव कम करें। काम के साथ आराम को भी प्राथमिकता दें।
7–8 घंटे की नींद, हेल्दी डाइट और नियमित व्यायाम मूड केमिकल्स को बैलेंस करने में मदद करते हैं।
सोशल मीडिया तुलना से बचें। दूसरों की परफेक्ट लाइफ देखकर खुद को कम नहीं समझें।
डिजिटल ब्रेक लेना जरूरी है।
निष्कर्ष
हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन वो खामोश तनाव है जो चेहरे की मुस्कान के पीछे छिपा रहता है। यह व्यक्ति को कामकाजी, सफल और सामाजिक रूप से सक्रिय बनाए रखता है, लेकिन भीतर ही भीतर उसे भावनात्मक रूप से थका देता है। यही कारण है कि इस मानसिक स्थिति को पहचानना मुश्किल हो जाता है। समय रहते लक्षणों को समझना, प्रोफेशनल मदद लेना और सपोर्ट सिस्टम मजबूत रखना बेहद जरूरी है
हाई फंक्शनिंग डिप्रेशन को साइकोलॉजी में समझे तो ये ऐसा तनाव है जिसमें इंसान में तनाव के लक्षण तो होते हैं लेकिन उस तनाव को वो अपने काम,अपनी डेली एक्टिविटी और सोशल मीडिया लाइफ में दाखिल नहीं होने देता। फोर्टिस हेल्थकेयर में अदायु माइंडफुलनेस हॉस्पिटल में सलाहकार मनोचिकित्सक डॉ. नेहा अग्रवाल से जब हमने कबीर की मानसिक स्थिति को साझा किया तो उन्होंने बताया मनोविज्ञान की भाषा में इसे डिस्थीमिया (Dysthymia) या पर्सिस्टेंट डिप्रेसिव डिसऑर्डर कहा जाता है, लेकिन आम बोलचाल में हम इसे हाई फंक्शनिंग डिप्रेशन कहते हैं। ये तनाव का एक ऐसा मायाजाल है जिसमें इंसान दूसरों की नजरों में काफी सफल, कामयाब और खुशमिजाज़ दिखता है लेकिन वो मानसिक रूप से खालीपन से जूझ रहा होता है। इस डिप्रेशन को स्माइली डिप्रेशन भी कहते हैं।
हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन के लक्षण
हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन के लक्षण नॉर्मल डिप्रेशन से कुछ अलग होते हैं। नॉर्मल डिप्रेशन में इंसान अकेला रहता है,उदास रहता है सोशल लाइफ से दूर भागता है लेकिन हाई फंक्शनिंग डिप्रेशन में इंसान ऊपर से कुछ भी जाहिर नहीं करता। वो अकेला नहीं रहता, तनाव दिखाता नहीं, रोता नहीं बल्कि हंसता है। इस तरह के तनाव में इंसान जैसे ही घर लौटता है तो वो गहरी खामोशी और तनाव में डूब जाता है।
ये वो अवसाद है जो बिस्तर पर नहीं लेटाता, बल्कि आपको एक रोबोट की तरह काम करने पर मजबूर कर देता है। इस तनाव से पीड़ित इंसान अंदर से उदास रहता है, उसे किसी काम को करने से अंदर से खुशी नहीं मिलती वो सिर्फ दिखावा के लिए सब कुछ करता है। कॉमन डिप्रेशन से शिकार इंसान के लक्षण लोगों को दिखते हैं लेकिन हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन में लोगों को इसके लक्षण नहीं दिखते। इस तनाव के लक्षणों की बात करें तोअत्यधिक परफेक्शनलिज्म
सामाजिक मेलजोल के बाद भारी थकान महसूस होना।
भोजन और नींद के पैटर्न में बदलाव
खुद की उपलब्धियों पर गर्व न होना
रोबोट की तरह लगातार काम करना, चाहें मन हो ना हो शामिल है।
किन लोगों में है हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन बढ़ने का खतरा
हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन होने का सबसे ज्यादा खतरा युवाओं में खासतौर पर महिलाओं में होता है। जॉब के कारण और खुद को घर और बाहर साबित करने की जिद युवाओं को इस डिप्रेशन का शिकार बना रही है। कुछ युवाओं को जॉब जाने का खतरा रहता है तो कुछ पर जिम्मेदारियों का बोझ बहुत ज्यादा है। कुछ लोग रिश्तों को सुधारने के लिए, नए रिश्ते बनाने के लिए लगातार जद्दोजहद करते रहते हैं और फिर भी उन्हें कामयाबी नहीं मिलती, ऐसे लोग भी हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन का शिकार होते हैं।
हाई प्रोफेशानिज्म इस डिप्रेशन का कारण है। सोशल मीडिया भी कई बार इस तनाव का कारण बनता है। सोशल मीडिया पर लोगों को खुश देखकर खुद से कंपैरिजन करते हैं और अंदर से तनाव में आते हैं। इस तरह के तनाव में जेनेटिक फैक्टर भी जिम्मेदार हो सकते हैं। इस डिप्रेशन के लिए डिप्रेशन लाइफस्टाइल, क्रोनिक स्ट्रेस, ट्रॉमा और पर्सनालिटी फैक्टर्स भी अहम भूमिका निभाते हैं।
न्यूरोट्रांसमीटर और हार्मोन का असंतुलन है जिम्मेदार
हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन के लिए सेरोटोनिन,डोपामिन,नोरएपिनेफ्रीन ,कोर्टिसोल, मेलाटोनिन हार्मोन जिम्मेदार हो सकते हैं। इन हार्मोन के असंतुलन से नींद, मूड,थकान,फोकस,मूड और मानसिक स्थिति पर पड़ता है। जब मस्तिष्क में सेरोटोनिन का स्तर गिरता है, तो व्यक्ति चाहकर भी खुश महसूस नहीं कर पाता। यह स्थिति केवल इच्छाशक्ति की कमी नहीं है। हमारे मस्तिष्क में कुछ न्यूरोट्रांसमीटर और हार्मोन होते हैं जो हमारे व्यवहार को कंट्रोल करते हैं।
क्या इस डिप्रेशन में मरीज सुसाइड भी कर सकता है ?
डॉक्टर नेहा ने बताया अगर इस बीमारी के लक्षणों को समय पर समझा नहीं जाए तो ये स्थिति गंभीर हो सकती है। ऐसी स्थिति में मरीज के मन में खुद को नुकसान पहुंचाने के भी ख्याल आते हैं। अगर आप भी अपने आस-पास इस तरह के किसी शख्स को देखते हैं तो इस हेल्पलाइन नंबर पर सूचना दे सकते हैं। KIRAN: 1800-599-0019 इस नंबर पर मेंटल हेल्थ से जुड़े मुद्दों को गंभीरता से समझा जाता है और उनका समाधान भी किया जाता है।
हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन का डायग्नोज कैसे किया जाता है?
इस तनाव का पता लगाने के लिए साइकॉलोजिस्ट व्यक्ति से उसके मूड, व्यवहार, नींद, भूख, एनर्जी के स्तर और रोजमर्रा की कार्यक्षमता के बारे में विस्तार से बात करते हैं। अगर उदासी, खालीपन, थकान, कम आत्म-सम्मान जैसे लक्षण कम से कम 2 साल तक लगातार बने हुए है को हाई फंक्शनिंग डिप्रेशन की आशंका हो सकती है।
कुछ स्क्रीनिंग टेस्ट पहचान करने में करते हैं मददPHQ-9 (Patient Health Questionnaire)
BDI (Beck Depression Inventory) ये टेस्ट लक्षणों की गंभीरता को मापने में मदद करते हैं।
हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन से कैसे बचाव करेंइस तनाव से बाहर आने के लिए मेडिटेशन असरदार होता है। ध्यान इस तनाव से बाहर आने में मदद करता है।
फैमिली और फ्रेंड्स इस परेशानी से बाहर आने में स्पोर्टिव इन्वायरमेंट देता है। दवाओं और थेरेपी के साथ फैमिली फ्रेंड का स्पोर्टिव माहौल इस तनाव से उबरने में मदद करता है।
अपनी भावनाओं को स्वीकार करें। मैं ठीक हूं का मुखौटा हटा दें और अंदर की उदासी और खालीपन को दूर करने पर काम करें।
वर्क-लाइफ बैलेंस बनाएं। लगातार परफॉर्म करने का दबाव कम करें। काम के साथ आराम को भी प्राथमिकता दें।
7–8 घंटे की नींद, हेल्दी डाइट और नियमित व्यायाम मूड केमिकल्स को बैलेंस करने में मदद करते हैं।
सोशल मीडिया तुलना से बचें। दूसरों की परफेक्ट लाइफ देखकर खुद को कम नहीं समझें।
डिजिटल ब्रेक लेना जरूरी है।
निष्कर्ष
हाई-फंक्शनिंग डिप्रेशन वो खामोश तनाव है जो चेहरे की मुस्कान के पीछे छिपा रहता है। यह व्यक्ति को कामकाजी, सफल और सामाजिक रूप से सक्रिय बनाए रखता है, लेकिन भीतर ही भीतर उसे भावनात्मक रूप से थका देता है। यही कारण है कि इस मानसिक स्थिति को पहचानना मुश्किल हो जाता है। समय रहते लक्षणों को समझना, प्रोफेशनल मदद लेना और सपोर्ट सिस्टम मजबूत रखना बेहद जरूरी है
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