झारखंड के ओल्ड उलीडीह में बाहा पर्व पर हो समाज ने बच्चों का कुतिया से प्रतीकात्मक विवाह कराया. ये शादी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुई. जहां हो समाज के लोग भी इसे बच्चों की सुरक्षा के लिए आस्था में उठाया गया कदम मानते हैं, वहीं सवाल उठता है कि क्या इससे अंधविश्विस की जड़े गहरी हो रही हैं.
जमशेदपुर. झारखंड के आदिवासी हो समाज की संस्कृति और परंपराएं आज भी अपनी जड़ों से गहराई से जुड़ी हुई हैं. आधुनिक शिक्षा, तकनीक और वैज्ञानिक सोच के विस्तार के बावजूद यह समाज अपनी सदियों पुरानी मान्यताओं और रीति-रिवाजों को सहेज कर आगे बढ़ रहा है. ऐसी ही एक अनोखी और चर्चित परंपरा बाहा पर्व के अवसर पर देखने को मिलती है, जब उन बच्चों की प्रतीकात्मक शादी कुतिया से कराई जाती है, जिनका पहला दांत ऊपर की ओर निकलता है.
रीति-रिवाजों के साथ पूरा हुआ अनुष्ठान
रविवार को जमशेदपुर के ओल्ड उलीडीह क्षेत्र में इस परंपरा का सजीव उदाहरण देखने को मिला. यहां कई बच्चों का यह अनुष्ठान पूरे पारंपरिक रीति-रिवाज और उत्सव के माहौल में संपन्न कराया गया. बच्चों को पारंपरिक वेशभूषा में सजाया गया, ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच रस्में निभाई गईं और समाज के बुजुर्गों ने मंत्रोच्चार व आशीर्वाद के साथ अनुष्ठान पूरा कराया.
बच्चे के भविष्य के लिए निभाई जाती है यह परंपरा
हो समाज की मान्यता है कि जिन बच्चों का ऊपरी दांत पहले निकलता है, उनके जीवन में ग्रह दोष या किसी तरह का अशुभ प्रभाव पड़ सकता है. इस संभावित दोष को दूर करने के लिए कुतिया से प्रतीकात्मक विवाह कराया जाता है. समाज के लोग साफ करते हैं कि यह वास्तविक विवाह नहीं, बल्कि एक धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान है, जिसका उद्देश्य बच्चे के भविष्य को सुरक्षित और शुभ बनाना होता है.
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